शानन पन बिजली परियोजना ने दी जोगिन्दर नगर को पहचान

शानन पन बिजली परियोजना ने दी जोगिन्दर नगर को पहचान

शानन पन बिजली परियोजना ने दी जोगिन्दर नगर को पहचान1925 में शुरू हुआ परियोजना का काम, 1932 में बनकर हुई तैयारजोगिन्दर नगर में उत्तर भारत की 110 मैगावॉट की पहली पन बिजली परियोजना (शानन परियोजना) (ऊहल चरण-एक) के निर्मित होने के चलते यह कस्बा एकाएक पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया। शानन पन बिजली परियोजना के कारण जोगिन्दर नगर न केवल हिमाचल प्रदेश बल्कि पूरी दुनिया में जाना जाता है।सन 1922 को तत्कालीन पंजाब सरकार के चीफ इंजीनियर कर्नल बी.सी. बैटी ने जोगिन्दर नगर व बरोट के बीच 48 मैगावॉट की पन बिजली परियोजना बनाने की योजना बनाई। इसके बाद वर्ष 1925 में मंडी रियासत के तत्कालीन राजा जोगिन्द्रसेन तथा सैक्रेटरी ऑफ स्टेट इन इंडिया केमध्य सकरोहटी गांव के समीप पन बिजली परियोजना निर्मित करने को 3 मार्च, 1925 को लाहौर में एक समझौता हुआ। इस समझौते के बाद राजा जोगिन्द्रसेन के नाम पर सकरोहटी गांव का नाम बदलकर जोगिन्दर नगर कर दिया गया।

इसके बाद इंजीनियर कर्नल बैटी ने अपनी टीम के साथ सकरोहटी गांव की पहाड़ी के दूसरी ओर स्थित बरोट से सुरंग के माध्यम से ऊहल नदी का पानी लाने की योजना पर कार्य शुरू किया। इस सुरंग में पानी की बड़ी-बड़ी पाईपें बिछाकर सकरोहटी गांव के शानन नामक स्थान तक लाया गया। शानन में बिजली घर स्थापित किया गया तथा भारी भरकम मशीनरी को शानन से बरोट तक की पहाड़ी में पहुंचाने के लिए 1928 में हौलेज ट्राली लाइन का भी निर्माण किया गया।कर्नल बैटी ने ब्रिटेन से आयातित भारी भरकम मशीनों को शानन तक पहुंचाने के लिए पठानकोट से जोगिन्दर नगर के शानन तक संकरी रेलवे लाइन (नैरोगेज लाइन) बिछाई गई जो वर्ष 1929 में शुरू हो गई। साथ ही शानन से बरोट तक सामान ले जाने के लिए लोहे के रस्सों की सहायता से चलने वाली हौलेज ट्राली मार्ग को भी बनाया गया।

ऊहल नदी के पानी को सुंरग के माध्यम से शानन लाने के लिए बरोट में डैम का भी निर्माण किया गया। वर्ष 1932 में शानन पन बिजली परियोजना के विद्युत गृह का निर्माण पूरा हुआ तथा जोगिन्दर नगर मैगावॉट स्तर की पन बिजली परियोजना के कारण एकाएक पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया। कुल 2 करोड़ 53 लाख 43 हजार 709 रूपये की लागत से यह प्रोजेक्ट बनकर तैयार हुआ।इस परियोजना का सपना संजोने वाले कर्नल बीसी बैटी की धारीवाल (होशियारपुर) पंजाब के समीप दुर्घटना में वर्ष 1932 को मौत हो गई।

कर्नल बैटी की मौत के बाद 10 मार्च, 1933 को तत्कालीन वायसराय ऑफ इंडिया ने लाहौर के शालीमार रिसीविंग स्टेशन में बटन दबाकर इस परियोजना का शुभांरभ किया था। इसके बाद वर्ष 1982 में शानन पन बिजली परियोजना के उत्पादन स्तर को बढ़ाने के लिए अतिरिक्त 50 मैगावॉट क्षमता को जोड़ा गया तथा इसकी कुल उत्पादन क्षमता बढक़र 110 मैगावॉट हो गई।जोगिन्दर नगर हिमाचल प्रदेश के उन गिने चुने स्थानों में शामिल है जो रेल नेटवर्क के साथ जुड़ा हुआ है। जोगिन्दर नगर से प्रतिदिन पठानकोट के लिए रेल सुविधा उपलब्ध है।

भले ही ऐतिहासिक दृष्टि से शानन विद्युत गृह तक रेल सुविधा उपलब्ध नहीं है लेकिन अभी भी यह रेलवे ट्रैक यहां मौजूद है, जो यहां के इतिहास को बयान कर रहा है। शानन विद्युत गृह से बरोट के मध्य बिछाई गई हौलेज ट्राली लाइन आज भी मौजूद है। वर्ष 1966 में पंजाब राज्य पुर्नगठन के दौरान प्रदेश की पहली मैगावॉट स्तर की शानन पन बिजली परियोजना पंजाब सरकार को 99 वर्ष की लीज पर दे दी गई। वर्तमान में यहां पैदा होने वाली बिजली की आपूर्ति पंजाब राज्य को की जाती है।शानन विद्युत गृह में स्थापित कर्नल बैटी की प्रतिमा को प्रणाम करने के बाद शुरू होता है कार्यशानन पन विद्युत गृह में इस परियोजना के निर्माता कर्नल बी.सी. बैटी की तांबे से तैयार एक पट्टिका स्थापित की गई है। जिसमें कर्नल बैटी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके चित्र को उकेरा गया है।

कहते हैं कि प्रतिदिन विद्युत गृह में कार्य करने वाले कर्मचारी सर्वप्रथम कर्नल बैटी की प्रतिमा के आगे उन्हे प्रणाम करते हैं उसके बाद ही वे अपना कार्य शुरू करते हैं। इसके अलावा कभी यदि कोई नया कर्मचारी इस परियोजना में ड्यूटी ज्वाईन करता है तो सर्वप्रथम कर्नल बैटी को ही मिष्ठान इत्यादि का भोग लगाया जाता है। विद्युत गृह में काम करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि यदि भूलवश वे कर्नल बैटी को प्रणाम करना भूल जाते हैं तो उनके साथ कई तरह की अनहोनी घटनाएं भी घटित हो चुकी हैं।शानन पन बिजली परियोजना को तैयार करने के लिये ढेलू में स्थापित हुआ था सूक्ष्म पॉवर हाउसशानन पन बिजली परियोजना को तैयार करने के लिये जोगिन्दर नगर के समीप ढेलू में एक सूक्ष्म पॉवर हाउस स्थापित किया गया था। इस पॉवर हाऊस से तैयार बिजली के माध्यम से ही शानन पन बिजली परियोजना के कार्यों को अंजाम तक पहुंचाया गया।

ढेलू में स्थापित इस सूक्ष्म पॉवर हाऊस की मशीनरी अभी भी वर्तमान शानन पॉवर हाऊस में मौजूद है।अनूठी है लोहे के रस्सों की सहायता से चलने वाली हौलेज ट्राली शानन पन बिजली परियोजना के निर्माण में लोहे के रस्सों की सहायता से चलने वाली हौलेज ट्राली का एक अहम रोल रहा है। इसी हौलेज ट्राली के माध्यम से पॉवर हाऊस निर्माण में लगने वाली बड़ी-बड़ी मशीनों को न केवल ऊंची पहाड़ी तक ही पहुंचाया गया बल्कि इन्हे पहाड़ी के दूसरी ओर बरोट तक भी ले जाया गया। पॉवर हाऊस निर्माण के समय मशीनों को लाने ले जाने का हौलेज ट्राली ही एक मात्र साधन था। अभी भी यह हौलेज ट्राली मौजूद है तथा समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार भी किया गया है।हॉलेज ट्राली लाइन चार चरणों में पूरी होती है। पहला चरण पॉवर हॉउस से 18 नम्बर तक जिसकी लंबाई लगभग डेढ किलोमीटर है। दूसरा चरण 18 नम्बर से विंच कैंप तक है जिसकी लंबाई भी लगभग डेढ़ किलोमीटर है। तीसरा चरण विंच कैंप से हेड गियर तक है जिसकी लंबाई लगभग अढ़ाई किलोमीटर है तथा चौथा चरण हेड गियर से जीरो प्वाईंट (बरोट) तक है। इसके आलावा जीरों प्वाईंट से लेकर बरोट में स्थापित जलाशय तक भी यह ट्रैक मौजूद था, लेकिन वर्तमान में इसे उखाड़ दिया गया है।

अहम बात तो यह है कि हौलेज ट्राली के माध्यम से जोगिन्दर नगर से बरोट की दूरी महज 12 किलोमीटर है लेकिन सडक़ मार्ग से यह सफर 40 किलोमीटर के आसपास है। यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि शानन पॉवर हाउस का निर्माण इसी ट्राली लाइन के तहत ही हुआ है जबकि जानकारी के अनुसार बरोट गांव 70 के दशक में सडक़ मार्ग से जुड़ा है।ब्रिटेन से आयातित मशीनरी को पॉवर हाउस तक लाने को बना था जोगिन्दर नगर-पठानकोट रेलवे ट्रैकशानन पॉवर हाउस निर्माण में लगने वाली ब्रिटेन से आयातित भारी भरकम मशीनरी को पहुंचाने के लिये ही पठानकोट से शानन तक रेलवे ट्रैक का निर्माण करवाया गया। अंग्रेज इंजीनियर एवं सैनिक कर्नल बीसी बैटी ने ही वर्ष 1925 में इस रेलवे ट्रैक निर्माण का प्रस्ताव रखा था। 164 किलोमीटर लंबी 2 फीट 6 ईंच नैरोगेज लाइन पर एक अप्रैल, 1929 को यात्री यातायात आरंभ किया गया। वर्तमान में जोगिन्दर नगर रेलवे स्टेशन से लेकर शानन पॉवर हाउस तक रेल की आवाजाही नहीं होती है, लेकिन ट्रैक अभी भी मौजूद है। इस रेलवे परियोजना को पूर्ण करने के लिये 296 लाख रूपये की राशि खर्च हुई थी।